आज देशभर में लाखों मजदूर और किसान अपने हक़ की आवाज़ बुलंद करने सड़कों पर हैं।मजदूरों को डर है कि चार श्रम संहिताएँ उनके अधिकारों को कमजोर कर देंगी। किसानों को आशंका है कि व्यापार समझौता उनकी आजीविका पर चोट करेगा। और मनरेगा को कमजोर या खत्म करने से गांवों का आख़िरी सहारा भी छिन सकता है।जब उनके भविष्य से जुड़े फैसले लिए गए, उनकी आवाज़ को नज़रअंदाज़ किया गया।क्या मोदीजी अब सुनेंगे? या उन पर किसी “grip” की पकड़ बहुत मज़बूत है? मैं मजदूरों और किसानों के मुद्दों और उनके संघर्ष के साथ मजबूती से खड़ा हूँ।

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